भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार। Fundamental Rights in Indian Constitution

हर देश के नागरिक को अपने समग्र विकास के लिए सरकार द्वारा कुछ मौलिक अधिकार दिए जाते हैं। ऐसे ही मौलिक अधिकार हमारे संविधान में भी वर्णित है। भारतीय संविधान में हमें कौन कौन से मौलिक अधिकार दिए गए हैं। इनके बारे में आज के हमारे इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे। भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार। Fundamental Rights in Indian Constitution

मौलिक अधिकार से क्या मतलब है? मौलिक अधिकारों से आश्य उन अधिकारों से है जो व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक तथा अनिवार्य है। जिन अधिकारों में राज्य द्वारा भी हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। इसलिए आप यह कह सकते हैं कि किसी भी देश के नागरिक के मानसिक, मौलिक तथा नैतिक विकास के लिए अधिकार आवश्यक होता है। इसीलिए कोई भी देश अपने नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार देती है। ताकि, वहां के नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मूल अधिकार प्रदान की जा सकती है।

मौलिक अधिकार का इतिहास – History of Fundamental Rights

  • भारत में सबसे पहले मौलिक अधिकार की मांग बाल गंगाधर तिलक ने वर्ष 1895 में अपने स्वराज विधेयक में की थी।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साल 1917 से लेकर के 1919 के बीच में ब्रिटिश शासन से इसकी मांग की थी लेकिन भारतीयों को अंग्रेजों के समान सिविल अधिकार तथा समानता का अधिकार मिल सके।
  • वर्ष 1928 में नेहरू प्रतिवेदन तथा साल 1931 के दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भी मूल अधिकारों की मांग की गई थी।
  • वर्ष 1945 में भारतीय संविधान के संबंध में तेज बहादुर द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन में भारतीय संविधान में मूल अधिकारों को समावेशित करने की संस्तुति की गई थी।
  • संविधान निर्माण के समय आचार्य J. B Kripalani की अध्यक्षता में मौलिक अधिकारों एवं अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर संस्तुति देने के लिए उप समिति बनाई गई थी।

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार – Fundamental Rights in Indian Constitution

हमारे भारतीय संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद, 14-35 में मौलिक अधिकार का वर्णन किया गया है। इसके अलावा हम आपको यह बता देना चाहते हैं कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 और 13 में भी मौलिक अधिकारों से संबंधित चीजों का वर्णन किया गया है। भारतीय संविधान के भाग 3 को भारत का अधिकार पत्र मेग्नाकार्टा (Magna Carta) कहा जाता है। भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार का विचार संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है। जब संविधान में मौलिक अधिकारों को सम्मिलित किया गया था, उस समय भारतीय नागरिकों को 7 मौलिक अधिकार प्राप्त थे।

लेकिन, वर्ष 1978 में संविधान में हुए 44 वें संविधान संशोधन के द्वारा प्रदत संपत्ति के अधिकार को वापस ले लिया गया और संपत्ति के अधिकार को मात्र एक वैधानिक अधिकार बना दिया गया। इस तरह से देखा जाए तो भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकों को 6 मौलिक अधिकार ही प्राप्त है। जोकि निम्नलिखित हैं :-

  1. समानता का अधिकार ( अनुच्छेद 14 से 18 )
  2. स्वतंत्रता का अधिकार ( अनुच्छेद 19 से 22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार ( अनुच्छेद 23 से 24)
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार ( अनुच्छेद 25 से 28)
  5. सांस्कृतिक एवं शिक्षा संबंधी अधिकार ( अनुच्छेद 29 से 30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार ( अनुच्छेद 32 से 35)

समानता का अधिकार ( अनुच्छेद 14 से 18)

किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए समानता का अधिकार उसके नागरिकों के लिए एक रीड की हड्डी होती है। यानी कि, लोगों के बीच भेदभाव ना हो एवं सभी के लिए एक ही कानून हो, यह किसी भी देश के नागरिकों के लिए बहुत ही जरूरी होती है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में समानता के अधिकारों पर प्रकाश डाला गया है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार के पीछे प्रेरणा स्रोत फ्रांस, इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका का संवैधानिक विकास रहा है। समानता के अधिकार के अंतर्गत अनुच्छेद 14 से 18 में निम्नलिखित मौलिक अधिकार भारतीय नागरिकों को प्राप्त है।

कानून के समक्ष समानता ( अनुच्छेद 14) – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष समानता के अधिकार के बारे में विवेचना की गई है। इसके अनुसार राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता तथा कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं कर पाएगा। कानून के समक्ष समानता से आशय यह है कि कानून की नजर में सभी व्यक्ति समान होंगे। अन्य शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि भारत में दोहरी विधि प्रणाली नहीं है। सामान्य स्थितियों में सबके साथ समान व्यवहार किया जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति कानून के समक्ष समान है तथा किसी भी व्यक्ति को कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता है।

धर्म, जाति, नस्ल, जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव निषेध ( अनुच्छेद 15) – भारतीय संविधान में अनुच्छेद 15 में संबंध सामाजिक समानता से है। इसके अनुसार राज्य द्वारा धर्म, वंश, जाति, लिंग एवं जन्म स्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ असमानता या भेदभाव नहीं किया जा सकता है। इन आधारों पर सार्वजनिक अस्थान जैसे कि कुएं, तलाब स्नानघर और सड़क आदि पर नागरिकों के मध्य भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

अनुच्छेद 15 में दो शब्द नागरिक और राज्य का प्रयोग किया गया है जिसका इस संदर्भ में विशेष अर्थ निकलता है। जो व्यक्ति राज्य का नागरिक नहीं है उसके विरूद्ध ऊपर दिए गए आधार पर भी भेदभाव किया जा सकता है।

  • अनुच्छेद 15 में राज्य शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया है। क्योंकि यह बंधन केवल राज्य पर ही लागू होता है, अन्य व्यक्तियों पर नहीं। अनुच्छेद 15 में स्पष्ट कहा गया है कि केवल जाति, मूल वंश, धर्म, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। लेकिन राज्यों में मेडिकल तथा इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश के लिए निवास स्थान की अहर्ता के आधार पर भेदभाव किया जा सकता है।
  • इसके अलावा अनुच्छेद 15 (1) मैं सामान्यता धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। लेकिन प्रत्येक धर्म के अपने अपने सिद्धांतों, रीति-रिवाजों पर आधारित कुछ व्यक्तिगत कानून है जिनका राज्यों द्वारा आदर एवं सम्मान किया जाता है। हिंदू धर्म के अनुयाई एक समय में एक ही पत्नी रख सकते हैं लेकिन इस्लाम धर्म के अनुयाई एक समय में एक से अधिक पत्नी रख सकते हैं।
  • इसी तरह से देखा जाए तो धर्म एवं जाति के आधार पर भेदभाव तो नहीं किया जा सकता है। परंतु कुछ विशेष परिस्थितियों में जैसे शिक्षा, रोजगार आदि चीजों में आरक्षण नीति अपनाते हुए भेदभाव हो सकता है।

सरकारी नौकरियों में समान अवसर का अधिकार ( अनुच्छेद 16) – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 में सभी नागरिकों को नौकरियों में समान अवसर प्रदान करने का अधिकार दिया गया है। इसी के अंतर्गत अनुच्छेद 16 दो में राज्य किसी भी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग और जन्मस्थान या निवास स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं कर सकता है।

अस्पृश्यता का अंत ( अनुच्छेद 17) – भारतीय संविधान में अस्पृश्यता को एक सामाजिक बुराई के रूप में स्वीकार किया गया है। अनुच्छेद 17 के अंतर्गत इसको समाप्त कर दिया गया है। वर्ष 1955 में सांसद द्वारा अस्पृश्यता कानून पारित किया गया जिसके अंतर्गत इसे एक दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।

उपाधियों का अंत ( अनुच्छेद 18) – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18 में यह प्रावधान किया गया है कि सेना और विद्या संबंधी उपाधियों को छोड़कर राज्य कोई अन्य उपाधि नहीं प्रदान कर सकता है। इसके अलावा कोई भी भारतीय नागरिक राष्ट्रपति की अनुमति के बिना किसी विदेशी उपाधि को प्राप्त नहीं कर सकता है।

स्वतंत्रता का अधिकार ( अनुच्छेद 19 से 22)

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 19 से 22 में स्वतंत्रता के अधिकारों का समावेश किया गया है। संविधान द्वारा मिले स्वतंत्रता को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से मूलभूत स्वतंत्रता तथा विशेष स्वतंत्रता ओं का वर्गीकरण करके हम इसके बारे में पढ़ सकते हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्रदत स्वतंत्रता का अधिकार मूलभूत स्वतंत्रता से संबंधित है। मूल संविधान में भारतीय नागरिकों को 7 मूलभूत स्वतंत्रता प्रदान की गई है लेकिन 44 वें संशोधन के द्वारा संपत्ति की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया गया है। स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित स्वतंत्रता है प्राप्त है।

  1. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  2. अस्त्र-शस्त्र रहित एवं शांतिपूर्ण सम्मेलन करने की स्वतंत्रता
  3. सामुदायिक और संघ बनाने की स्वतंत्रता
  4. भारतीय क्षेत्र में निर्विरोध भ्रमण करने की स्वतंत्रता
  5. भारत के किसी भी भाग में निवास करने की स्वतंत्रता
  6. व्यवसाय करने की स्वतंत्रता
  7. अपराध सिद्ध के संदर्भ में सुरक्षा
  8. जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
  9. गिरफ्तारी एवं वंदीकरण के विरुद्ध सुरक्षा का अधिकार

शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 से 24 में शोषण के विरुद्ध अधिकार के संबंध में संरक्षण प्रदान किया गया है। जिसके अंतर्गत मानव के दुर्व्यवहार तथा बाल श्रम के प्रतिरोध उसे है। अनुच्छेद 23 के अंतर्गत मनुष्य के क्रय विक्रय को निषेध कर दिया गया है और इस व्यवस्था के उल्लंघन को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।

इस प्रावधान का उद्देश्य व्यभिचार के उद्देश्य महिलाओं के क्रय विक्रय पर रोक लगाना है। किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी भी व्यक्ति से जबरदस्ती बिना पगार के अर्थात बिना मजदूरी दिए कार्य करवाना को भी दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। लेकिन इस प्रावधान का अपवाद यह है कि राज्य सर्वजनिक उद्देश्य अनिवार्य श्रम योजना लागू कर सकता है।

इसी के अंतर्गत 14 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों को कारखाना या किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)

भारतीय संविधान के अंतर्गत अनुच्छेद 25 से लेकर के 28 में धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी अधिकारों का समावेश किया गया है। भारत संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। आपको बता दें कि भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द 42 वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।

धर्मनिरपेक्ष शब्द से यह अर्थ नहीं निकलता कि लोगों का धर्म में विश्वास नहीं है। बल्कि भारत में अनेक धर्म के अनुयाई रहते हैं। इसलिए भारतीय संविधान द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई है।

सांस्कृतिक एवं शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से लेकर के 30 तक)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 में नागरिकों विशेष अल्पसंख्यकों के संस्कृतिक और शिक्षा संबंधी अधिकारों के बारे में बताया गया है। अल्पसंख्यक शब्द का संविधान में किसी भी तरह का कोई परिभाषा नहीं है। हालांकि अनुच्छेद 30 के आधार पर संविधान में दो प्रकार के अल्पसंख्यकों का वर्णन देखने को मिलता है। भाषा एवं धार्मिक अल्पसंख्यक और सांस्कृतिक एवं शिक्षा संबंधी अधिकारों से जुड़े अल्पसंख्यक। इसके अंतर्गत भारत के किसी भी नागरिक को निम्नलिखित अधिकार दिए गए हैं।

  • अनुच्छेद 29 – में वर्णित प्रावधानों के अनुसार प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा की लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार प्राप्त है। इसके अलावा राजकीय सहायता से यह आंशिक रूप से संचालित शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश को भाषा, धर्म, जाति वंश लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  • अनुच्छेद 30 – इसके अंतर्गत अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थानों की स्थापना एवं उनके संचालन का अधिकार प्राप्त है।

संविधानिक उपचारों का अधिकार ( अनुच्छेद 32)

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के उल्लेख के साथ-साथ उन को व्यवहार में लागू करने के लिए भी प्रावधान किया गया है। इसी आधार पर संविधान के अनुच्छेद 32 में इसके महत्व के बारे में प्रकाश डाला गया है।

संविधान के अनुच्छेद 32 एवं अनुच्छेद 226 में भारतीय न्यायपालिका को मौलिक अधिकारों के अभिन्न रक्षक के रूप में स्थापित करता है। अनुच्छेद 32 जहां सर्वोच्च न्यायालय को प्रलेख जारी करने का अधिकार देता है, वही अनुच्छेद 226 राज्यों के उच्च न्यायालयों को भी प्रलेख जारी करने का अधिकार देता है। कोई भी नागरिक मौलिक अधिकार का उल्लंघन होने पर या होने की आशंका पर न्यायपालिका की शरण ले सकता है। इसी प्रकार यदि सांसद अथवा राज्य विधानसभा में कोई ऐसी विधि का निर्माण करता है जिससे मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण होता है तो उस विधि को न्यायपालिका असंवैधानिक करार दे सकती है।