What is National Income? राष्ट्रीय आय क्या है?

What is National Income? राष्ट्रीय आय क्या है? किसी भी देश की प्रगति की गणना उसकी राष्ट्रीय आय से की जाती है। राष्ट्रीय आय से मतलब है किसी भी देश में 1 वर्ष की अवधि में उत्पादित होने वाले समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य के जोड़ से है। जिसे हर्ष को घटा करके एवं विदेशी लाभ को जोड़कर निकाला जाता है।

आज के हमारे इस लेख में हम इस बारे में जानकारी लेंगे की What is National Income? राष्ट्रीय आय क्या है? इसके अलावा हम अपने इस लेख में राष्ट्रीय आय की महत्वता, राष्ट्रीय आय का सूत्र क्या है? इन सारे विषयों पर चर्चा करने वाले हैं।

What is National Income? राष्ट्रीय आय क्या है?

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पूरे वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के शुद्ध मूल्य के योग्य को राष्ट्रीय आय कहा जाता है। जब भी राष्ट्रीय आय बोला जाता है तो इसका अर्थ होता है कि किसी भी देश में 1 वर्ष की अवधि में उत्पादित होने वाली समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य के जोड़ से है जिसे हर्ष को घटा करके एवं विदेशी लाभ को जोड़ करके निकाला जाता है।

प्रोफेसर अलफ्रेड मार्शल के अनुसार :- “ देश के प्राकृतिक संसाधनों पर श्रम और पूंजी द्वारा कार्य करने पर प्रति वर्ष विभिन्न भौतिक एवं अभौतिक वस्तुओं और सेवाओं का जो उत्पादन होता है उन सभी केस उद्योग को देश का वास्तविक वार्षिक आय कहा जाता है”।

भारतीय राष्ट्रीय आय समिति वर्ष 1949 के अनुसार, “राष्ट्रीय आय के प्रचलन के लिए किसी अवधि विशेष में उत्पन्न वस्तुओं और सेवाओं की मात्रा को दो बार गिने बिना मापा जाता है”।

राष्ट्रीय आय (National Income) की क्या विशेषता है?

ऊपर दिए गए परिभाषा के अनुसार हम राष्ट्रीय आय की कुछ विशेषताओं के बारे में बात कर सकते हैं। इसके परिभाषा के अनुसार इसके निम्नलिखित विशेषताएं हो सकती है:-

  • राष्ट्रीय आय वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य का योग होता है।
  • राष्ट्रीय आय किसी एक देश की 1 वर्ष की आय हैं।
  • राष्ट्रीय आय में पूंजी की गिरावट को घटाया एवं विदेश से प्राप्त शुद्ध लाभ को जोड़ा जाता है।
  • राष्ट्रीय आय में एक साधन को एक बार ही गिना जाता है।
  • राष्ट्रीय आय एक माप है जो धन में नापी जाती है।

राष्ट्रीय आय की गणना किस प्रकार की जाती है? इसका सूत्र क्या है?

राष्ट्रीय आय की गणना करने के लिए इसका एक सूत्र भी है। जिसे हम नीचे दर्शा रहे हैं:-

राष्ट्रीय आय  = C+I+G – D+E – M

C = राष्ट्रीय आय के अंतर्गत कुल उपभोग व्वय।            I = कुल विनियोग।                                                  G = कुल सार्वजनिक खर्चे।                                       E = विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय । E = निर्यात का मूल्य। M = आयातों का मूल्य को घटाने से प्राप्त होती है। इस प्रकार प्राप्त राशि में से पूंजी हर्ष को घटा दिया जाता है।

राष्ट्रीय आय की गणना किस प्रकार होती है?

राष्ट्रीय आय की गणना करने के लिए विभिन्न अवधारणाओं का उपयोग किया जाता है। इन अलग-अलग अवधारणाओं का उपयोग किस बात पर निर्भर करता है कि राष्ट्रीय आय के आंकड़ों का प्रयोग किस उद्देश्य हेतु किया जाएगा। इसके अंतर्गत निम्नलिखित चीजें आती है:-

  1. सकल राष्ट्रीय उत्पाद
  2. सकल घरेलू उत्पाद
  3. शुद्ध घरेलू उत्पाद
  4. बाजार मूल्य पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
  5. साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद अथवा राष्ट्रीय आय
  6. व्यक्तिक आय

राष्ट्रीय आय से मतलब किसी भी देश की अर्थव्यवस्था द्वारा पूरे 1 वर्ष के दौरान उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के शुद्ध मूल्य के योग से होता है, इसमें विदेशों से अर्जित शुद्ध आय को भी शामिल किया जाता है।

जॉन मार्शल के अनुसार – “ किसी भी देश की श्रम एवं पूंजी उसी देश के प्राकृतिक संसाधनों के साथ मिलकर के प्रति वर्ष कुछ भौतिक एवं अभौतिक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जिसमें सेवाएं भी शामिल होती है इसी के बाजार मूल्य को राष्ट्रीय आय कहते हैं। जिसमें विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय भी शामिल होता है ”.

राष्ट्रीय आय का अध्ययन क्यों किया जाता है?

किसी भी देश में राष्ट्रीय आय का विश्लेषण यानी कि मैं राष्ट्रीय आय का लेखा-जोखा करने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण होते हैं। जो कि निम्न लिखित हो सकते हैं।

  1. किसी भी देश की आर्थिक विकास की गति को मापने के लिए राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में होने वाली वृद्धि का विश्लेषण किया जाता है।
  2. दो या दो से अधिक देशों के बीच आर्थिक विकास की गति की तुलना करने के लिए राष्ट्रीय आय का विश्लेषण करना अनिवार्य होता है।
  3. राष्ट्रीय आय विश्लेषण के माध्यम से क्षेत्रीय विकास की समीक्षा की जा सकती है और यह पता लगाया जा सकता है कि कौन सा क्षेत्र अधिक विकसित हो रहा है और कौन सा क्षेत्र कम विकसित है।
  4. राष्ट्रीय आय के विश्लेषण द्वारा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में प्राथमिक क्षेत्र, दिव्य क्षेत्र और तृतीय क्षेत्र के विकास एवं उनके योगदान के बारे में पता लगाया जा सकता है।
  5. किसी भी देश की समस्त भावी आर्थिक नीति का निर्धारण राष्ट्रीय आय के विश्लेषण के द्वारा किया जा सकता है।

सकल घरेलू उत्पाद क्या है?

किसी भी देश में 1 वर्ष के भीतर उस देश के नागरिकों द्वारा उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं में मौद्रिक मूल्य जिसमें विदेशों से मिलने वाली शुद्ध आए भी शामिल होती है, सकल घरेलू उत्पाद (G.N.P) कहलाता है।

GNP = C+I+G+ (X-M)

C = उपभोक्ता वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए , I = घरेलू निवेश , G = सरकारी खर्चे, (X-M) = शुद्ध विदेशी आय के निर्यात एवं आयतों के अंतर को

शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद की गणना करने के लिए सकल घरेलू उत्पाद वैसे मूल्य हर्ष को घटा दिया जाता है।

NNP = GNP – मुल्य हर्ष

GNP = NNP – मूल्य हर्ष

शुद्ध घरेलू उत्पाद ( Net Domestic Product – NDP) क्या है?

शुद्ध घरेलू उत्पाद को सकल घरेलू उत्पाद में से मूल्य हर्ष को घटाकर ( अथवा शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में से विदेशी आए को घटा करके )प्राप्त किया जाता है।

शुद्ध घरेलू उत्पाद (NDP) = GDP – Depreciation

राष्ट्रीय आय की मापन विधि

राष्ट्रीय आय को मापने के लिए चार विधियों का इस्तेमाल किया जाता है। जो कि निम्नलिखित है :-

  1. उत्पादन गणना विधि (Census of Production Method)
  2. आय गणना विधि (Census of Income Method)
  3. व्यय गणना विधि (Census of Expenditure Method)
  4. सामाजिक लेखन विधि (Social Accounting Method)

उत्पादन गणना विधि

इस विधि में राष्ट्रीय आय को उत्पादन के आधार पर गणना की जाती है। इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था को विभिन्न भागों अथवा क्षेत्रों में बांट दिया जाता है। जैसे कि प्राथमिक क्षेत्र जिसके अंतर्गत कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वाणी की आधी आते हैं। द्वितीयक क्षेत्र में उद्योग, निर्माण, गैस और विद्युत उत्पादन आदि चीजें आती है। तृतीय क्षेत्र में बैंक, बीमा, परिवहन, संचार ,व्यापार, होटल, लोक प्रशासन, सामाजिक एवं व्यक्तिक सेवाएं आदि आते हैं।

इसके बाद अर्थव्यवस्था के इन भागो एवं क्षेत्रों में 1 वर्ष में उत्पादित होने वाली वस्तुओं एवं सेवाओं का बाजार मूल्य पर योग कर लिया जाता है। इसी योग को राष्ट्रीय आय कहा जाता है।

उत्पादन करना विधि से राष्ट्रीय आय की माफ करने में इस बात को ध्यान में रखना होता है कि 1 वर्ष में उत्पादित वस्तुओं की गणना बार-बार ना की जाए। इस दोहरी गणना से बचने के लिए मध्यवर्ती पदार्थों के मूल्य को सम्मिलित ना करके केवल अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यों को ही शामिल किया जाता है। शुद्ध राष्ट्रीय आय को ज्ञात करने के लिए उत्पादन के मूल्य हर्ष को घटा दिया जाता है परंतु विदेशी आए को जोड़ दिया जाता है।

आय गणना विधि

आय गणना विधि में राष्ट्रीय आय की गणना विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत उत्पाद के उत्पादन साधनों को 1 वर्ष में उनकी सेवाओं के बदले में प्राप्त होने वाले प्रतिफल के योग से निकाला जाता है। इसके लिए आए के विभिन्न वर्ग किए जाते हैं। जैसे कि मजदूरी और वेतन, व्यक्तियों की किराए की आय, कंपनियों के लाभ,, ब्याज की आए, गैर कंपनी व्यवसाय की आय आदि।

इन सभी वर्गों को 1 वर्ष में प्राप्त होने वाली आय राशियों को जोड़कर राष्ट्रीय आय ज्ञात की जाती है। यह आई विधि के प्रयोग का विशेष लाभ है इसमें देश में विभिन्न वर्गों में आय के वितरण की जानकारी मिलती है।

इस विधि को अपनाने में विभिन्न बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे कि गैर उत्पादन कार्यों से संबंधित भुगतान ( उदाहरण वृद्धावस्था पेंशन, निर्धनों को सहायता भुगतान आदि) को इसमें ना जोड़ा जाए, दोबारा मूल्यांकन ना किया जाए, मुद्रा में भुगतान न किए जाने वाली सेवाएं को सम्मिलित ना किया जाए, गैरकानूनी रूप से प्राप्त आय को शामिल किया जाए।

व्यय गणना विधि

इसके अंतर्गत उपभोक्ता बचत विधि भी कहते हैं। इस विधि में राष्ट्रीय आय को मापने के लिए देश द्वारा किए जाने वाले का योग करके उसमें बचत या निवेश की राशि को जोड़ दिया जाता है। इन सब के योग से जो राशि प्राप्त होती है उसे राष्ट्रीय आय माना जाता है। यह विधि इस तथ्य पर आधारित है कि एक व्यक्ति अपनी कुल आय का कुछ भाग उपभोग पर खर्च करता है, तो शेष भाग बचत या निवेश करता है।

अंतः देखा जाए तो राष्ट्रीय आय कुल उपभोग और कुल बचत का योग होती है। इस विधि से राष्ट्रीय आय की गणना करने के लिए उपभोक्ताओं की आय तथा उनकी बचत से संबंधित सही आंकड़े उपलब्ध होना इत्यादि जरूरी होता है। सामान्यता सही आंकड़े आसानी से प्राप्त ना होने के कारण इस विधि का अधिक उपयोग नहीं किया जाता है।

सामाजिक लेखन विधि

राष्ट्रीय आय को मापने के लिए सामाजिक लेखन विधि का प्रतिपादन कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड स्टोन ने किया था। इस विधि से राष्ट्रीय आय को मापने के साथ ही देश की संपूर्ण आर्थिक संरचना, क्षेत्रीय अंत संबंध एवं आर्थिक क्रियाओं का विस्तृत ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इस विधि में संपूर्ण अर्थव्यवस्था को पांच भागों में विभाजित किया जाता है।

  • अंतिम उपभोक्ता
  • उत्पादन संस्थान
  • वित्तीय संस्थान
  • बीमा
  • सामाजिक सुरक्षा संस्थान एवं अन्य

इन प्रत्येक भाग के लिए चार प्रकार के खाते रखने होते हैं। संचालन खाता, पूंजी खाता, संचित खाता एवं चालू खाता। इन सभी वर्गों के विभिन्न खातों का योग करने पर हमें राष्ट्रीय आय प्राप्त होती है। सामाजिक लेखन विधि का प्रयोग तभी संभव है जब सभी संस्थान, व्यक्ति एवं सरकार आने लेनदेन का सही हिसाब रखें। ऐसा न करने पर इस विधि का प्रयोग सीमित हो जाता है।

भारत जैसे देश में राष्ट्रीय आय की गणना करने के लिए उत्पादन गणना विधि और आय गणना विधि का सम्मिलित रूप से प्रयोग किया जाता है।

राष्ट्रीय आय की गणना करने में कठिनाइयां

राष्ट्रीय आय का प्रत्येक देश के लिए बहुत ही अधिक महत्व होता है लेकिन इस को मापने में विभिन्न प्रकार की व्यावहारिक कठिनाइयां आती है, यह निम्नलिखित है :-

  1. मुद्रा में भुगतान न किया जाना
  2. अमौद्रिक विनिमय
  3. विदेशी कंपनियों द्वारा देश में उत्पादन करना
  4. खुद के उपभोग हेतु रखी गई वस्तुएं
  5. सही एवं पर्याप्त आंकड़ों का अभाव
  6. जन सहयोग की कमी
  7. मध्यवर्ती एवं अंतिम पदार्थ का निर्धारण करना कठिन

मुद्रा में भुगतान ना किया जाना :- राष्ट्रीय आय की गणना मुद्रा में की जाती है, लेकिन उत्पादित की जाने वाली अनेक वस्तुएं एवं सेवा इस प्रकार की होती है कि उनका मूल्य मुद्रा में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक ग्रहणी द्वारा अपने परिवार के लिए दी गई सेवाएं, कार के मालिक द्वारा स्वयं कार चलाना आदि। भारत में युवा सेवाएं राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं की जाती है, जिससे राष्ट्रीय आय के आंकड़े सही प्रतीत नहीं होते हैं।

अमौद्रिक विनिमय :- देश में राष्ट्रीय आय का सही अनुमान लगाने के लिए उस देश में अर्थव्यवस्था का संगठित होना एवं वस्तुओं एवं सेवाओं का मुद्रा में विनिमय आवश्यक होता है। लेकिन भारत में स्थिति भिन्न है भारत एक ऐसा देश है जहां की अधिकांश जनसंख्या गांव में निवास करती है और गांव में खरीद बिक्री मुद्रा का प्रयोग सीमित मात्रा में ही होता है। अंतर या ज्ञात करना कठिन है कि कितने उत्पादन का इस प्रकार विनिमय हुआ है। ऐसे में राष्ट्रीय आय का सही अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है।

विदेशी कंपनियों द्वारा देश में उत्पादन करना :- एक देश में विदेशी कंपनियों द्वारा कार्य करने पर यह समस्या आती है कि इन कंपनियों की आय को किस देश की राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाए। समानता तो विदेशी कंपनियों की आय उस देश की राष्ट्रीय आय में सम्मिलित की जाती है जिस देश में यह उत्पादन करती है। लेकिन व्यवहारिक रूप में यह विदेशी कंपनी अर्जित लाभ को अपने देश में भेजने के लिए प्रयासरत रहती है।

खुद के उपयोग हेतु रखी गई वस्तुएं :- खुद के उपयोग के लिए रखी गई वस्तुएं भी राष्ट्रीय की आय की गणना में कठिनाइयां उत्पन्न करती है। उत्पादित की जाने वाली वस्तुओं का एक भाग ऐसा होता है जो खरीद बिक्री हेतु बाजार में नहीं लाया जाता है बल्कि इसे उत्पादक अपने उपभोग के लिए रख लेता है। इससे इन वस्तुओं का बाजार मूल्य ज्ञात करने में कठिनाई होती है। कृषि उपज के संबंध में स्थिति अधिक देखने को मिलती है।

सही एवं पर्याप्त आंकड़ों का अभाव :- राष्ट्रीय आय की गणना करने के लिए अनेक प्रकार के आंकड़ों की आवश्यकता होती है, जैसे कि उत्पादन, लागत, बचत, उपभोग व्यय, कार्यशील जनसंख्या, मजदूरी और लाभ आदि। लेकिन भारत जैसे विशाल एवं विकासशील देश में आंकड़ों का संग्रह करना बहुत ही कठिन हो जाता है। अधिक प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा इन आंकड़ों का संग्रह नहीं किया जाना आंकड़ों को अपर्याप्त और गलत साबित करता है।

जन सहयोग की कमी :- जन सहयोग की कमी भी राष्ट्रीय आय की गणना में कठिनाइयां उत्पन्न करती है। राष्ट्रीय आय से संबंधित आंकड़ों के संग्रह के समय देश के लोगों द्वारा आयकर लगने के बाद अथवा सही हिसाब ना रखने के कारण सही सूचनाएं नहीं दी जाती है जिससे राष्ट्रीय आय के सही आंकड़े प्राप्त नहीं होते हैं।

मध्यवर्ती एवं अंतिम पदार्थ का निर्धारण करना कठिन :- राष्ट्रीय आय में मध्यवर्ती को शामिल न करके केवल अंतिम वस्तु को ही शामिल किया जाता है। लेकिन कभी-कभी मध्यवर्ती वस्तु अथवा अंतिम वस्तु निर्धारण करना कठिन हो जाता है। अनेक पदार्थ ऐसे होते हैं जो एक रूप में तो मध्यवर्ती है परंतु दूसरे रूप में अंतिम वस्तु है। जैसे गेहूं का आटा आदि।