सूर्य ग्रहण क्यों होता है? Solar eclipse in Hindi

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दोस्तों आपने सूर्य ग्रहण के बारे में तो जरूर सुना होगा। और कई बार समाचार पत्रों या फिर टीवी में इसका जिक्र होते हुए आपने एक ना एक बार इसके बारे में चर्चा जरूर सुनी होगी।

सूर्य ग्रहण एक तरह का ग्रहण ही होता है, जब चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य के मध्य से होकर के गुजरती है। उस समय आप धरती से सूर्य को देखेंगे तो चंद्रमा आंशिक या पूरी तरह से सूर्य को ढक लेती है। जिसके चलते हम इसे सूर्यग्रहण कहते हैं।

भौतिक विज्ञान की दृष्टि से

भौतिक विज्ञान की दृष्टि से जब सूर्य व पृथ्वी के बीच में आ जाता है। तब चंद्रमा के पीछे सूर्य का एक परछाई के चलते सूर्य को ढक लेती है। इसी प्रकृतिक घटना को हम सूर्यग्रहण कहते हैं।

जिस तरह से धरती सूर्य की परिक्रमा करती है। उसी तरह से चंद्रमा दी धरती की परिक्रमा करने के साथ-साथ सूर्य की परिक्रमा भी करती है। इसी के परिणाम स्वरूप सूर्य ग्रहण के दौरान पृथ्वी, चंद्रमा और सूरज एक ही सीधी लाइन में आ जाते हैं। जिसके चलते सूर्य आंशिक या पूरी तरह से ढक जाता है। फिर वह सूरज की कुछ या बहुत ही रोशनी रोक लेता है। जिससे धरती पर साया फैल जाता है इस घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है। यह घटना सदा सर्वदा अमावस्या को ही होती है।

सूर्य ग्रहण कितने प्रकार के होते हैं?

सूर्य ग्रहण को चंद्रमा द्वारा सूर्य को पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से ढक लेने पर इसे अलग-अलग नाम दिए गए हैं। इसी के आधार पर इसे तीन प्रकार के सूर्य ग्रहण के रूप में विभाजित किया गया है।

  1. पूर्ण सूर्य ग्रहण
  2. आंशिक सूर्यग्रहण
  3. वलयाकार सूर्यग्रहण

पूर्ण सूर्य ग्रहण

पूर्ण सूर्य ग्रहण में जब चंद्रमा पृथ्वी के काफी पास रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाती है। जिसके चलते यह पूरी तरह से सूर्य को ढक लेती है। या आप यह कह सकते हैं कि चंद्रमा पूरी तरह से पृथ्वी को अपने छाया क्षेत्र में ले लेती है। जिसके परिणाम स्वरूप सूर्य की रोशनी धरती पर पहुंचने पाती है। दिन में भी चारों तरफ अंधेरा दिखने लगता है। धरती से सूर्य पूरी तरह से दिखाई नहीं देता। इस तरह के सूर्य ग्रहण को हम पूर्ण सूर्य ग्रहण कहते हैं। Solar eclipse

आंशिक सूर्यग्रहण

आंशिक सूर्य ग्रहण में जब चंद्रमा सूर्य व पृथ्वी के बीच में इस तरह आ जाती है कि सूर्य का कुछ भाग पृथ्वी से दिखाई देता है। परंतु कुछ भाग पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं, जब पृथ्वी चंद्रमा और सूर्य एक सी थी रेखा में ना हो करके थोड़ी तिरछी रेखा में होती है। तब धरती से सूर्य आधा या कुछ भाग ही दिखाई देता है। तब हम इसे आंशिक सूर्यग्रहण कहते हैं। Solar eclipse

वलयाकार सूर्यग्रहण

वलयाकार सूर्यग्रहण में जब चंद्रमा धरती से काफी दूर होती है। और पृथ्वी और सूर्य के बीच में आजादी है, यानी कि सूर्य को चंद्रमा कुछ इस प्रकार से ढकती है। जिससे कि सूर्य का केवल मध्य भाग ही छाया क्षेत्र में आता है। और पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा द्वारा सूर्य पूरी तरह से ढका दिखाई नहीं देता। सूर्य के बाहर का क्षेत्र प्रकाशित होने के कारण कंगन या वलयाकार रूप में चमकदार दिखाई देता है। कंगन के आकार में बने सूर्य ग्रहण को ही वलयाकार सूर्यग्रहण कहते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सूर्य ग्रहण

सूर्य ग्रहण का हर धर्म में कोई ना कोई आध्यात्मिक महत्व है। और इसके प्रति लोगों की अपनी अपनी अलग-अलग राय है। लेकिन दुनियाभर के वैज्ञानिकों के लिए या अवसर किसी उत्साह से कम नहीं होता है। क्योंकि सूर्य ग्रहण ही वह समय होता है जब ब्रह्मांड में अनेकों विलक्षण एवं अद्भुत घटनाएं घटित होती है जिससे कि वैज्ञानिकों को नए नए तथ्यों पर कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है।

साल 1968 में लार्कयर नाम के एक वैज्ञानिक ने सूर्य ग्रहण के अवसर पर ही कई खोज किए थे। उन्होंने सूर्य ग्रहण के अवसर में सौर मंडल में हिलियम गैस की उपस्थिति का पता लगाया था। आइंस्टाइन काया प्रतिपादन भी सूर्य ग्रहण के अवसर पर ही सही सिद्ध हो सका, जिसमें उन्होंने अन्य पिंडों के गुरुत्वाकर्षण से ही प्रकाश के पडने की बात कही थी। Solar eclipse

वहीं अगर हम चंद्र ग्रहण की बात करें तो यह अपने संपूर्ण तत्कालीन प्रकाश क्षेत्र में देखा जा सकता है। लेकिन सूर्य ग्रहण अधिकतम 10000 किलोमीटर लंबे और 250 किलोमीटर चौड़ा क्षेत्र में ही देखा जा सकता है। वही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एक संपूर्ण सूर्य ग्रहण में अधिकतम 11 मिनट लगते हैं। उससे अधिक नहीं।

सूर्य ग्रहण के समय कुछ प्रचलित कथन

सूर्य ग्रहण के समय बहुत से कथन प्रचलित है। यह सारे कथन हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय जैसे कि भोजन के लिए मनाही, क्योंकि उनकी मान्यता था कि ग्रहण के समय में कीटाणु बहुत तेजी से फैलते हैं। खाद वस्तु एवं जल आदि चीजों में जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। Solar eclipse

वही पुराणों की मान्यताओं के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रस्ता है। यह दोनों ही छाया की संतान है। चंद्रमा और सूर्य की छाया के साथ साथ चलते हैं। चंद्र ग्रहण के समय खांसी कफ की प्रधानता बढ़ती है और मन की शक्ति क्षीण होती जाती है। गर्भवती स्त्री को सूर्य या चंद्र ग्रहण देखना अशुभ माना जाता है।ऐसा इसलिए क्योंकि यह मान्यता है कि गर्भवती स्त्री यदि सूर्य या चंद्र ग्रहण को देख ले तो गर्भपात होने की संभावना होती है। ऐसी भी मान्यता है कि सूर्य ग्रहण के दौरान अगर गर्भवती स्त्री सूर्य को देख लेती है तो उसके दुष्प्रभाव के चलते शिशु अंग हीन होकर विकलांग हो सकता है। कई मान्यताओं में गर्भवती स्त्री को गोबर का लेप लगाने की सलाह भी दी जाती है जिससे कि राहु एवं केतु के दुष्प्रभाव के चलते शिशु पर कोई असर ना हो। वही ऐसी भी मान्यता है कि सूर्य ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्री को चाकू या कैची आदि चीजों से कुछ भी काटने को मना किया जाता है और किसी वस्त्र आदि को सिलने से भी रोका जाता है। क्योंकि ऐसा करने से शिशु के अंगिया तो कट जाते हैं या फिर सील जाते हैं।वहीं यह भी मान्यता है कि ग्रहण लगने के पूर्व नदिया घर के अंदर रखे जल से स्नान करके भगवान का पूजन यज्ञ, जाप करना चाहिए। घर के अंदर पूजा के अलावा भजन कीर्तन करके समय का सदुपयोग करना चाहिए। सूर्य के ग्रहण के दौरान किसी भी तरह का क्रियाकलाप नहीं करना चाहिए। सूर्य ग्रहण की अवधि के दौरान तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल मूत्र त्याग करना, केस बनाना, रति क्रीड़ा करना आदि चीजों के लिए मना ही है।

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