What is Currency inflation? मुद्रास्फीति क्या होती है?

मुद्रास्फीति किसी भी अर्थव्यवस्था के त्रिक् में से एक है। मुद्रास्फीति का मतलब बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में लगातार वृद्धि से होता है। मुद्रास्फीति की स्थिति में मुद्रा की कीमत कम हो जाती है क्योंकि उपभोक्ताओं को बाजार में वस्तुएं खरीदने के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। किसी भी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति के चलते कौन-कौन सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है? इसके अलावा मुद्रास्फीति की परिभाषा क्या है? इन सारी चीजों के ऊपर आज के हमारे इस लेख में हम जानने की कोशिश करेंगे। What is Currency inflation? मुद्रास्फीति क्या होती है?

मुद्रास्फीति, किसी भी अर्थव्यवस्था की बाजार की एक ऐसी अवस्था होती है जिसमें उपभोक्ता झोला भर कर के रुपया बाजार ले जाता है और हाथ में सब्जियां लेकर के आता है। मुद्रास्फीति को समझने के लिए एक या साधारण सा उदाहरण है। मुद्रास्फीति के दो तत्व होते हैं।

  1. विनिमय दर
  2. वृद्धि दर

महंगाई आम आदमी को प्रभावित करने वाले सबसे प्रमुख कारण होता है। कीमतों के सामान्य स्तर में बढ़ोतरी, कीमतों के सामान्य स्तर में वृद्धि, कीमतों के सामान्य स्तर में लगातार वृद्धि, अर्थव्यवस्था में कीमतों के सामान्य स्तर में कुछ समय से लगातार बढ़ोतरी हो रही हो, सभी चीजों के दाम बढ़ रहे हो तो यह मंगाई है। यह मुद्रास्फीति को कुछ बेहद प्रचलित किताबी परिभाषाएं हैं। अगर किसी एक चीज के दाम बढ़े हैं तो यह महंगाई नहीं है। मुद्रास्फीति तब तक है जब तक अधिकतर चीजों के दाम बढ़ गए हो।

मुद्रास्फीति की परिभाषा – Definition of Currency inflation

मुद्रास्फीति दर को मूल्य सूचकांक (Price Indices) क्या आधार पर मापा जाता है, जो दो तरह की होती है।

  1. मूल्य सूचकांक (Whole Sale Price Index – WPI)
  2. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index -CPI)

मूल्य सूचकांक किसी भी अर्थव्यवस्था में सूचकांक के औसत के स्तर की गणना करता है। यानी कि इसमें किसी एक विषय वस्तु के वास्तविक मूल्य का पता नहीं चलता है। अर्थात इससे किसी एक विषय वस्तु के वास्तविक मूल्य का मूल्य ज्ञात नहीं किया जा सकता है। मुद्रास्फीति दर सामान्य मूल्य स्तर में परिवर्तन की दर होती है, जिससे की माप निम्न प्रकार से मापी जाती है।

मुद्रास्फीति दर ( वर्ष X) = मूल्य स्तर ( वर्ष X) – मूल्य स्तर ( वर्ष X-1)/ मूल्य स्तर ( वर्ष X-1) × 100

किसी भी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की गणना करने के लिए ऊपर दिए गए सूत्र का इस्तेमाल किया जाता है। विपिन वर्षों के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद यह बात सामने आई है कि कम और नियंत्रित मुद्रास्फीति उद्यमियों को अधिक निवेश करने के लिए उत्साहित करता है। क्योंकि वस्तुएं और सेवाएं महंगी होने के साथ-साथ लागत की तुलना में अधिक कीमत मिलती है। लेकिन यदि उद्यमी ने इन लाभ को दोबारा निवेश नहीं किया और विलासिता की वस्तुओं पर खर्च कर दिया तो अर्थव्यवस्था को फायदा नहीं होगा। क्योंकि नए निवेश के अभाव में नए रोजगार का सृजन नहीं हो पाता है।

मुद्रास्फीति क्यों होती है?

मुद्रास्फीति क्यों होती है? इस मुद्दे पर अर्थशास्त्र में कई विद्वानों ने पूरी 19वीं शताब्दी से लेकर के बीसवीं सदी तक काफी बहस चली है। और विद्वानों के बीच में आज भी इसे लेकर के काफी बहस है। इस बहस के चलते ही हमें मुद्रास्फीति के कारण हो को दो भाग में बैठकर देख सकते हैं।

  1. 1970 के दशक से पहले
  2. 1970 के दशक के बाद

1970 के दशक से पहले जहां मुद्रा वादी स्कूल का चलन नहीं आया था। 1970 के दशक के बाद अर्थव्यवस्था के मुद्रा वादी स्कूल के उदय के बाद महंगाई की मुद्रा वादी व्याख्या उपलब्ध कराई गई थी। जब भी हम मुद्रास्फीति के बात करते हैं, तब हम इस बारे में चर्चा करने से पहले अर्थव्यवस्था की गणना के आधार पर 1970 के दशक के पहले एवं बाद के अर्थव्यवस्था को लेते हैं।

1970 के दशक से पहले

1970 के दशक के पहले जब मुद्रा वादी स्कूल का चलन नहीं आया था तब तक अर्थशास्त्री महंगाई के दो कारणों को लेकर सहमत थे।

1. मांग जनित मुद्रास्फीति (Demand Pull Inflation) :- मांग और पूर्ति के बीच संतुलन की वजह से दाम यानी की वस्तुओं के मूल्य स्तर बढ़ जाते हैं और फिर आपूर्ति कम हो जाती है। मांग के साथ और ऐसे में मांग की वजह से महंगाई बढ़ती है। यह कींस वादी विचार है। किंतु स्कूल का मानना है कि कर बढ़ाकर और सरकारी खर्चों में कटौती करके लोगों को खर्च करने से रोका जा सकता है और अतिरिक्त मांग पर काबू पाया जा सकता है।

व्यवहार में सरकारें ऐसी मांगों को रोकने के लिए मांग और आपूर्ति के ताने-बाने पर नजर रखती है। कई बार ऐसी परिस्थितियों के मुताबिक उन चीजों का आयात किया जाता है जिन की आपूर्ति कम होती है। रिन और ब्याज की दर बढ़ जाती है। मजदूरी को भी संशोधित किया जाता है।

2. लागत जनित मुद्रास्फीति (Cost Push Inflation) :- कारक इनपुट की लागत जैसे की मजदूरी और कच्चा माल में बढ़ोतरी की वजह से किसी भी वस्तु के कीमतें बढ़ जाती है। यानी किसी चीज के उत्पादन की लागत बढ़ने के कारण कीमतों में होने वाला बढ़ोतरी लागत की वजह से होने वाली महंगाई होती है।

किन्स स्कूल ने सुझाव दिया कि ऐसे महंगाई पर लगाम के लिए कीमतों और आय पर नियंत्रण सीधा असर डालता है। उनके मुताबिक नैतिक उत्तेजना को रोकने के लिए भी यह कारगर है और इसके अलावा ट्रेड यूनियनों की एक आधिकारिक शक्तियों को कम किया जाना भी एक अप्रत्यक्ष उपाय हो सकता है। आज दुनिया भर की सरकारें ऐसी महंगाई को रोकने के लिए कई उपाय अपनाती है। जैसे कच्चे माल पर एक्सरसाइज और कस्टम शुल्क में कमी और मजदूरी संशोधन इत्यादि।

1970 के दशक के बाद

1970 के शुरुआती दौर में अर्थव्यवस्था के मुद्रा वादी स्कूल के उदय के बाद ( मुद्रा बाद 1945 के बाद किन्स मांग प्रबंधन के विरोध के बाद विकसित हुआ) महंगाई को मुद्रा बादी व्याख्या उपलब्ध कराई गई, जोकि मांग जनित मुद्रास्फीति या लागत जनित मुद्रास्फीति जो अर्थव्यवस्था में मुद्रा के अधिक चलन की वजह से की गई थी।

1. मांग जनित मुद्रास्फीति (Demand Pull Inflation) :- मांग चयनित मंगाई मांग आधारित मुद्रास्फीति मुद्रा वादियों के लिए उपभोक्ता के पास उत्पादन के स्तर के समान रहने के दौरान अधिकारियों सकती आने की वजह से शुरू हुई। ऐसा माइक्रो स्तर पर वेतन के बढ़ने और मेट्रो स्तर पर डेफिसिट फाइनेंस की वजह से होता है। यह एक विशेष रूप से बिना उत्पादन या आपूर्ति का स्तर समान अनुपात में बढ़ाया हुआ अत्रिक मुद्रा लोगों के हाथ में देने का मामला है। चाहे अतिरिक्त नोट छाप कर या सार्वजनिक उधारी के जरिए। जैसे कि – ” रुपया बहुत ज्यादा है लेकिन खरीदने के लिए चीजें कम” – यह मांग जनित मुद्रास्फीति का मुख्य स्रोत है।

2. लागत जनित मुद्रास्फीति (Cost Push Production) :- इस तरह मुद्रा वादियों के लिए लागत जनित मुद्रास्फीति भी मंगाए की कोई स्वतंत्र अवधारणा नहीं है। यह कुछ अतिरिक्त मुद्रा द्वारा वित्त पोषित होती है। यह सरकार द्वारा किया जाता है, मजदूरी के संशोधन से, सार्वजनिक उधारी से या नोट छाप कर। वस्तु की कीमतों में वृद्धि को अपने उपभोक्ता की खरीदारी पर असर नहीं पड़ता है। बल्कि कुछ अतिरिक्त प्रिय शक्ति बनाए जाने की वजह से लोगों के पास अतिरिक्त पैसा आ जाता है और वह ऊंची कीमतों पर भी खरीदारी करने लगते हैं।

अगर ऐसा नहीं होता तो लोग अपने खपत अपनी खरीदने की क्षमता के हिसाब से कर लेते हैं और इससे चीजों को समग्र मांग नीचे आ जाती है। इससे चीजों को लागत जनित मुद्रास्फीति रुपयों की अधिकता मुद्रा आपूर्ति या आमद के बढ़ने का नतीजा है।

मुद्रास्फीति कितने प्रकार के होते हैं? Types of Currency Inflation

बढ़ती हुई मुद्रास्फीति इसकी गंभीरता के आधार पर इसे आप तीन वर्गों में अवर्गीकृत कर सकते हैं।

  1. अल्प मुद्रास्फीति (Low Inflation)
  2. सरपट मुद्रास्फीति (Galloping Inflation)
  3. अति मुद्रास्फीति (Hyper Inflation)

अल्प मुद्रास्फीति (Low Inflation)

ऐसी मुद्रास्फीति धीमी होती है और इसके पहले से भविष्यवाणी की जा सकती है। जिससे लघु अथवा कार्मिक कहा जा सकता है। जिससे या एक तुलनात्मक पद है जिस का विपरीत अर्थ दीर्घ तथा भविष्यवाणी नहीं किए जाने योग्य मुद्रास्फीति होती है। अल्प मुद्रास्फीति लंबी अवधि के दौरान देखने को मिलता है और इसमें वृद्धि सामान्यता एकल संख्या में होती है। ऐसी मुद्रास्फीति को सरकने वाली मुद्रास्फीति भी कहते हैं।

सरपट मुद्रास्फीति (Galloping Inflation)

यह अत्यंत उच्च मुद्रास्फीति होती है जो दोहरी अथवा टिहरी संख्याओं में चलती है जैसे कि 20%, 100% या 200% प्रतिवर्ष। साल 1970 से लेकर के साल 1980 के दशक में अर्जेंटीना, चिल्ली तथा ब्राजील जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में 50 से 700% तक मुद्रास्फीति की दर हुआ करती थी। साल 1980 के दशक के अंत में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूसी अर्थव्यवस्था में भी ऐसा ही अत्यंत उच्च मुद्रास्फीति दर्ज की गई थी।

समकालीन पत्रकारिता में इस मुद्रास्फीति को उछल कूद मुद्रास्फीति (Hoping Inflation) का भी नाम दिया गया है। तो कहीं-कहीं दौड़ती भागती मुद्रास्फीति के नाम से भी यह जाना जाता है।

अति मुद्रास्फीति (Hyper Inflation)

मुद्रास्फीति का रूप बड़ा और बढ़ता हुआ है जिसकी वार्षिक दर अरबों खरबों में हो सकती है। ऐसी मुद्रास्फीति में नात शरीफ बढ़त बहुत बड़ी होती है बल्कि यह बहुत कम समय के अंदर हो जाती है। वस्तु की कीमतें रातों-रात बढ़ जाती है।

अति मुद्रास्फीति का सबसे अच्छा उदाहरण अर्थशास्त्री साल 1920 के दशक की शुरुआत में प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी का मानते हैं। इस तरह की मुद्रास्फीति से घरेलू मुद्रा बहुत तेजी से अपना भरोसा खो देती है और लोग रुपए के दूसरे विकल्पों को अपनाना शुरू कर देते हैं। उदाहरण के लिए भौतिक वस्तुएं, जैसे सोना, विदेशी मुद्राएं और लोग लेनदेन के विनिमय को भी अपना लेते हैं।

मुद्रास्फीति की साधारण परिभाषा

मुद्रास्फीति की परिभाषा
जब मांग और आपूर्ति में असंतुलन पैदा होता है तो वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। कीमतों में इस वृद्धि को मुद्रास्फीति कहते हैं। भारत अपनी मुद्रास्फीति की गणना दो मूल्य सूचियों के आधार पर करता है- थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index- WPI) एवं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index- CPI)।

मुद्रास्फीति नियंत्रण के उपाय

  • सरकार ने मुद्रास्फीति के नियंत्रण हेतु कई उपाय किये हैं-
  • अनिवार्य वस्तुओं, खासकर दालों के मूल्य में अस्थिरता को नियंत्रित करने हेतु बजट में मूल्य स्थिरता कोष में बढ़ा हुआ आवंटन।
  • बाज़ार में समुचित दखल हेतु 20 लाख टन दालों का ऑफर स्टॉक रखने का अनुमोदन।
  • अनिवार्य वस्तु अधिनियम के अंतर्गत दालों, प्याज, खाद्य तेलों और खाद्य तेल के बीजों हेतु स्टॉक सीमा लागू करने के लिये राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को अधिकृत करना।
  • उत्पादन को प्रोत्साहित कर खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाने हेतु ताकि मूल्यों में सुधार हो।
  • उच्चतर मूल्य की घोषणा।