What is Star? – तारा क्या होता है? हमारा सौरमंडल

रात के समय आकाश में कई सारे टिमटिमाते तारे आपने जरूर देखे होंगे। टिमटिमाते तारे आकाश में रात की चांदनी को और भी खूबसूरत बना देते हैं। और साथ ही में हमारे मन में कई सारे सवाल भी खड़े करते हैं। हमारे इस ब्रह्मांड में कई सारे तारे, ग्रह, उपग्रह, और बहुत से सूर्य भी मौजूद है। आज हम अपने इस लेख में आप लोगों को यह बताएंगे कि तारा क्या होता है? What is Star? इसके साथ ही हम अपने सौरमंडल के बारे में भी जानेंगे।

तारा क्या होता है? – What is Star?

जिन आकाशीय पिंडों के पास में अपना खुद का प्रकाश होता है उसे तारा कहते हैं। जैसे कि हमारे सौरमंडल पर मौजूद सूर्य यह एक तारा ही है।

तारों के निर्माण में 70% हाइड्रोजन, 28% हीलियम, 1.5% कार्बन, नाइट्रोजन एवं नियॉन तथा 0.5% लोहा एवं अन्य भारी तत्व होते हैं।

कुछ विशेष आकृति वाले चमकीले तारों के समूह को तारामंडल कहते हैं। वर्तमान समय में 89 तारामंडल का नामकरण किया जा चुका है, जिसमें से प्रमुख तारामंडल के नाम है सप्त ऋषि, ध्रुव, मत्स्य, ओरियन, हाइड्रा, इत्यादि।

What is Star
सौर मंडल

तारों के प्रकार – Types of Star

हमारे ब्रह्मांड पर कई तरह के तारे मौजूद हैं। इनकी रोशनी देने की क्षमता, इनका आकार को देख करके इनका नामकरण किया गया है। इन्हीं आधारों पर हम तारों के प्रकार को रखते हैं।

आदि तारा (Proto Star) – हाइड्रोजन एवं हीलियम गैसों के संघनन से बने घने बादलों (Oort Cloud) का निर्माण होता है। अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण घने बादल सिकुड़ कर के तारे में परिवर्तित हो जाते हैं तो उसे आदि तारा (Proto Star) कहते हैं।

लाल दानव तारा (Red Giant Star) – जब तारे में हाइड्रोजन कम हो जाती है तो इसकी बाहरी सतह फूल कर लाल हो जाती है। इस तरह के तारे को लाल दानव (Red giant Star) तारा कहा जाता है।

श्वेत वामन तारा (White Dwarf Star) – यदि लाल दानव का द्रव्यमान सूर्य के दर मान के बराबर हो तो लाल दानव तारा श्वेत वामन (White Dwarf Star) मे बदल जाता है ।

न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star) – लाल दानव का द्रव्यमान सूर्य के धर्म से बहुत अधिक होता है तो उसमें विस्फोट होता है तथा न्यूट्रॉन तारे (Neutron Star) का निर्माण होता है।

कृष्ण वामन तारा (Black dwarf Star) – जब श्वेत वामन तारे के समस्त हीलियम का उपयोग हो जाता है तो वह कृष्ण वामन तारा में परिवर्तित हो जाता है।

नवतारा (Nova) – लाल दानव की विस्फोटक स्थिति को नवतारा (Nova) या आधी नवतारा (Supernova) कहा जाता है।

सौरमंडल

सूर्य की परिक्रमा करने वाले विभिन्न ग्रह, उल्का पिंड, धूमकेतु आदि आकाशीय पिंडों के समूह को सौरमंडल कहा जाता है।

इसके कुल गरमान्य का 99.97% भाग सूर्य में तथा 0.03% द्रव्यमान से पिण्डों पर सम्मानित है। बाकी बचे पेंट के कुल द्रव्यमान का 92% भाग बृहस्पति एवं शनि में समाहित है।

हमारे सौरमंडल में सभी ग्रह दीर्घ वृत्त (Elliptical) पथ पर सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सूर्य एवं यूरेनस ग्रह पूरब से पश्चिम दिशा यानी कि दक्षिणावर्त (clockwise direction) की दिशा में घूमते हैं, जबकि अन्य सभी ग्रह पश्चिम से पूरब दिशा यानी कि वामावर्त (anticlockwise direction) की दिशा में परिक्रमा करते हैं।

परिक्रमा करने का मुख्य कारण सूर्य एवं ग्रह के बीच का गुरुत्वाकर्षण बल होता है। इसके प्रभाव में सभी ग्रह अपने कक्षा के स्पर्श रेखीय दिशा में घूमते हैं।

सूर्य

  • सूर्य मिल्की वे गैलेक्सी का एक तारा है, जो मिल्की वे गैलेक्सी के चारों ओर 250 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से परिक्रमा करते हुए 25 करोड़ वर्ष में एक चक्कर लगाता है।
  • इस अवधि को ब्रह्मांड वर्ष (Cosmos Year) कहते हैं सूर्य एक गैस का पिंड है जिसमें 71% हाइड्रोजन, 26.5% हीलियम तथा 2.5% अन्य तत्व मौजूद है। सूर्य ठोस नहीं है इसी कारण से विभिन्न भागों में आसमान गति पाई जाती है।
  • परिणाम स्वरूप सूर्य को अपने अक्ष पर एक पूर्ण करने में मध्य भाग को 25 दिन एवं धुरिया भाग को 30 दिन का समय लगता है।

सूर्य की संरचना

सूर्य में निम्नलिखित स्तर पाए जाते हैं। जिस पर अलग-अलग तापमान होते हैं। इसे आप सूर्य की अलग-अलग परत भी कह सकते हैं। जिसके बारे में हम नीचे विस्तार से बता रहे हैं।

क्रोड – सूर्य के आंतरिक भाग को क्रोड या कोर (Core) कहते हैं। जहां पर नाभिकीय अभिक्रिया के कारण हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक मिलकर हीलियम परमाणु के नाभिक का निर्माण करते हैं जिससे बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा निकलती है। इस नाभिकीय अभिक्रिया के कारण ही सूर्य का तापमान केंद्र में 1,50,000,000 डिग्री सेल्सियस तथा सतह का तापमान 6000 डिग्री सेल्सियस होता है।

संवाहक घेरा – कोर के ठीक ऊपर के स्तर को संवाहक घेरा (Convective layer) कहते हैं।

प्रकाश मंडल – दिखाई देने वाले सूर्य की ऊपरी सतह को प्रकाश मंडल कहते हैं। इसी सतह से किरणों का विकिरण होता है। इससे ही सूर्य का व्यास निर्धारित होता है।

वर्ण मंडल – प्रकाश मंडल के ऊपर के सतह को वर्ण मंडल (chromosphere) कहते हैं इसका निर्माण मुख्य रूप से हाइड्रोजन गैस से हुआ है।

कोरोना – सूर्य के वायुमंडल के सबसे बाहरी मंडल को कोरोना का किरीट कहा जाता है। यह सूर्य ग्रहण के समय ही दिखाई देता है। इसमें अंतरिक्ष में एक्स किरणें विकर्ण करने की क्षमता होती है।

सौर कलंक – प्रकाश मंडल में ठंडे एवं अंधेरे धब्बों को सौर कलंक तथा गर्म एवं प्रकाशित भाग को फेकुला (Faculae) कहा जाता है। सौर कलंक सूर्य के चारों ओर प्रभावित होने वाले गैसों के खोल होते हैं, जिन का तापमान आसपास के तापमान से 1500 डिग्री सेल्सियस कम होता है। सौर कलंक एक या दो दिनों से लेकर के दो-तीन महीनों तक दिखाई देता है। सौर कलंक के समय पृथ्वी पर चुंबकीय झंझावत उत्पन्न होती है। इसमें रेडियो, टीवी और बिजली से चलने वाले उपकरणों में समस्या उत्पन्न हो सकती है।

सौर पवन – प्रकाश मंडल से निकलकर इलेक्ट्रॉन एवं प्रोटोन की प्रवाहित होने वाले धारा को वर्ण मंडल एवं कोरोना में सौर पवन (solar wind) कहा जाता है।

इस का तापमान 1,000,000°k से 2,000,000°k के आसपास होती है। जब कभी इन पौधों का अचानक विस्फोट होता है तो उसे सौर ज्वाला कहते हैं। इसमें निकलने वाली ऊर्जा एवं एटॉमिक कंस और पवन के साथ मिलकर पृथ्वी के चुंबकीय मंडल में प्रवेश करते हैं, तो ध्रुवीय प्रकाश (Auroral Light) का निर्माण होता है।

इसे उत्तरी गोलार्ध में उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Borealis) और दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिणी ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Australis) कहते हैं यह पराया आधी रात के समय दिखाई देते हैं।

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