झारखंड में भूमि संबंधी कानून CNT ,SPT Act और अन्य कानून

ब्रिटिश शासन के दौरान झारखंड में अधिकतर आदिवासियों के हितों की रक्षा करने के लिए, भूमि संबंधी कानून लाए गए थे. आज भी यह भूमि संबंधी कानून झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में लागू है. ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न प्रकार के कानून बनाए गए जो प्रशासनिक व्यवस्था को ब्रिटिश शासन के दौरान अपने अधीन लाने का एक बड़ा बड़े अंतर था. उस दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा यह भूमि संबंधी कानून लाने का मुख्य वजह अपने राजस्व में वृद्धि करना के साथ-साथ विभिन्न झारखंड में हो रहे विद्रोह का दमन करना था. इसी क्रम में न्यायालयों का उपयोग कर स्थानीय जमींदारों, जागीरदारों एवं रैयत की भूमि की नीलामी करना आरंभ कर दिया था. नीलामी से बचने हेतु जमींदारों एवं जागीरदारों ने कठोरता से लगान व सुनना शुरू कर दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि औरतों की स्थिति खराब होती गई. ऐसी स्थिति में रजत और अन्य किसी विकल्प के अभाव में अंग्रेजों एवं जमींदारों के विरुद्ध कई जगहों पर विद्रोह भी किए थे. इन विद्रोह में सबसे प्रमुख है सहल 1890 से लेकर के 1900 तक चली बिरसा मुंडा की मुंडा उलगुलान विद्रोह. जिसके परिणाम स्वरूप उस दौरान ब्रिटिश सरकार आदिवासियों की जमीन की बंदोबस्ती और उनके हितों और अधिकारों को ध्यान में रखकर के 11 नवंबर 1908 को छोटानागपुर काश्तकारी कानून लेकर के आए. CNT (Chotanagpur Tenancy Act) CNT Act in Hindi आज के हमारे इस लेख में हम झारखंड में विभिन्न भूमि संबंधी कानून जैसे कि CNT Act, SPT Act, और अन्य भूमि संबंधी कानून के बारे में विस्तार पूर्वक बताने वाले हैं.

CNT Act लाने के पीछे क्या कारण था?

जैसा कि आपने इसके बारे में ऊपर जिक्र किया है. ब्रिटिश सरकार का मुख्य उद्देश्य सही तरीके से अपने राजस्व में वृद्धि करना था. इसी क्रम में न्यायालयों का उपयोग कर स्थानीय जमींदारों, जागीरदारों और रैयत ने भूमि की नीलामी करना शुरू कर दिया था. नीलामी से बचने हेतु जमींदार और जागीरदार ने कठोरता से इन क्षेत्रों में लगान वसूलना शुरू कर दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि रैयत तो की स्थिति और भी खराब होती गई. जिसके चलते रजत और आदिवासी लोगों ने कई सारे विद्रोह शुरू कर दिए. जिसके चलते ब्रिटिश शासन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था. इन सभी चीजों में सुधार लाने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा बहुत से भूमि सुधार कानून बनाए गए. झारखंड में साल 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम लाया गया.

छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम आने से पहले तक, स्थानीय जमींदारों एवं जागीरदारों का अपने शब्दों के साथ सामाजिक संबंध था तथा व स्थानीय नियमों एवं परंपराओं का निर्वाह करते थे. भू अवस्था में भी जनजाति समाज में प्रचलित नियमों का सम्मान किया जाता था. स्थानीय जमींदार एवं जागीरदार भूमि हरि एवं मुंडारी कूट खट्टी भूमि पर किसी भी प्रकार का कोई हक या दावा नहीं करते थे.

छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908

साल 1765 ईस्वी में ब्रिटिश सरकार को बंगाल, उड़ीसा आदि क्षेत्रों की दीवानी सौंपी गई थी. यहां रहने वाले जमींदारों से टैक्स वसूलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मजबूर किया था. जिसके चलते जमींदार जबरन अधिक से अधिक टैक्स यहां के स्थानीय जनजातियों से वसूला करते थे. जिसके चलते यहां की जनजातियां खासकर आदिवासियों को काफी प्रताड़ित किया जाता रहा था.

इसका असर यह हुआ कि, कई सारे जनजातियों समूह ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह शुरू कर दिया था. हालांकि उस दौरान ब्रिटिश सरकार ने 1765 से लेकर के 1789 तक राजस्व अपने मनमाने ढंग से वसूला करती थी. उस दौरान बंगाल के मुर्शिदाबाद को भारतीय एजेंटों के लिए मुख्यालय बनाया गया था. जो की विभिन्न क्षेत्रों से संबंध रखते थे. इसी क्रम में दीवानी और जिलों की निगरानी रखने के लिए आमिल की नियुक्ति भी की गई थी. जिसके बाद प्रत्येक जिले में कलेक्टर की नियुक्ति की गई. जो Board of Revenue Kolkata कोलकाता के आधीन हुआ करते थे.

छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम से संबंधित कुछ प्रमुख प्रावधान और सम्मिलित अध्याय

छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम उन्नीस सौ आठ के अंतर्गत इसमें कुल मिलाकर के 19 अध्याय है. इन अध्ययन को धारा के अंतर्गत बांटा गया है. हम प्रत्येक अध्याय एवं उनसे जुड़े प्रमुख धाराओं के बारे में यहां पर चर्चा करने वाले हैं, जो कि निम्नलिखित है

अध्याय 1 प्रारंभिक

अध्याय 1 में धारा 1 से लेकर के 3 धाराएं हैं. अध्याय 1 के धारा एक में छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम उन्नीस सौ आठ का संक्षिप्त नाम एवं उसका प्रसार यानी कि यह किन क्षेत्रों एवं पर मंडलों में लागू होता है इसके बारे में जानकारी दी गई है. यहां पर विभिन्न भूमि एवं उससे जुड़ी चीजों को परिभाषित किया गया है.

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