वैशाखी क्यों मनाते हैं?

इस साल बैसाखी का पर्व 13 अप्रैल को मनाया जाने वाला है। इस दिन सिख धर्म के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। वैशाखी का अर्थ वैशाख माह का त्यौहार होता है। इस दिन को कई सारे लोग शोर मास का पहला दिन भी कहते हैं। वैशाखी का पर्व क्यों मनाया जाता है? इसके बारे में हम आज जानकारी लेने वाले हैं। वैशाखी क्यों मनाते हैं?

वैशाखी क्यों मनाते हैं?

भारत त्योहारों का देश माना जाता है। अलग-अलग धर्म का पालन करने वाले लोग यहां हमारे इस भारत देश में रहते हैं। हर धर्म के लोग हर साल कुछ खास त्यौहार मनाते हैं। पूरे साल भर इसी तेव्हार का उत्साह चलता रहता है। हिंदू धर्म में होली, दीपावली और रक्षाबंधन जैसे त्यौहार मनाए जाते हैं। उसी तरह से सीख लोगों के लिए चैत्र माह में पड़ने वाला बैसाखी का त्यौहार खास होता है। यह समय सिख लोगों के लिए खास होता है, यह तो मैं रवि की फसल तैयार हो जाती है। किसान अपनी मेहनत से आई फसलों को देखकर काफी खुश होते हैं। ऐसी मान्यता है कि लोग अपनी खुशी का इजहार करने के लिए बैसाखी का पर्व मनाते हैं।

लेकिन, वैशाखी को लेकर के और भी कई मान्यताएं एवं कहानियां है। हम अपने इस लेख में आप लोगों को इस मान्यताओं और इन कहानियों के बारे में भी जानकारी देंगे।

वैशाखी को मनाए जाने का एक मुख्य कारण यह भी है कि इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करती है। किसान भाई बहनों के लिए बैसाखी का पर्व खास होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि रवि की फसल खलियान और खेतों में लहाना लगती है। किसान भाई बहन अपने फसल के लिए ईश्वर को शुक्रिया करते हैं। इसी कारण ज्यादातर लोग यह सोचते हैं कि अच्छी फसल के लिए बैसाखी का पर्व मनाया जाता है।

अगर इतिहास के पन्नों को पलट कर के देखे तो सन 1699 मे इसी दिन सिखों के अंतिम गुरु गुरु गोविंद सिंह जी ने सिखों को खालसा के रूप में संगठित किया था। यह भी इस दिन को खास बनाने का एक मुख्य कारण है।

वैशाखी जिसे वैशाखी के रूप में भी जाना जाता है। हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाने वाला सिखों का पर्व है। या पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में काफी धूमधाम से मनाया जाता है। वैशाखी मुख्य रूप से सिख त्यौहार है जो सिख समुदाय के लिए नए साल का प्रतीक माना जाता है। केवल सिख धर्म के लोग ही नहीं अन्य धर्म के लोग भी इसे काफी धूमधाम से मनाते हैं। यह गुरु गोविंद सिंह के तहत योद्धा के खालसा पंथ को सम्मान देने का भी एक तरीका है।

मूल रूप से या एक हिंदू त्यौहार बैसाखी, गुरु अमर दास द्वारा एक मुख्य त्योहार के रूप में शामिल किया गया था और तब से पूरे विश्व के सिख समुदाय के लोग द्वारा इसे बड़े उत्साह के साथ में मनाते हैं। इस दिन पूरे भारत और विश्व में गुरुद्वारे को विशेष रूप से सजाया जाता है। इस दिन गुरुद्वारे में लोग काफी संख्या में पूजा करने आते हैं। नगर कीर्तन गुरुद्वारा से किया जाता है और लोग जुलूस के दौरान आनंद लेने के लिए नाचते गाते और पटाखे फोड़ते हैं। बहुत से लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और शक कर्मियों के साथ इस दिन को मनाने के लिए अपने घरों में इकट्ठा होते हैं और मिठाइयां इत्यादि चीजें एक दूसरे को बांटते हैं।

बैसाखी का पर्व कैसे मनाया जाता है?

बैसाखी का अर्थ वैशाख माह का त्यौहार होता है। हर साल 13 या 14 अप्रैल को यह पूरे भारतवर्ष में काफी धूमधाम से मनाया जाता है। हिंदू धर्म के लोग इस दिन गंगा नदी में स्नान करने को शुभ मानते हैं। वही, इस दिन कई जगहों पर मेला लगाया जाता है जहां काफी भीड़ होती है। बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है और इस कारण से इस दिन को मेष संक्रांति भी कहते हैं। यह पर्व हिंदुओं, बौद्ध और सिखों के लिए काफी महत्वपूर्ण पर्व है। इसी के साथ थी पूरे भारतवर्ष में इस दिन बहुत से नव वर्ष के त्यौहार जैसे बिहू, विशु इत्यादि भी मनाए जाते हैं।

इस दिन मेला और लोग धूमधाम से नाचते गाते हैं। इसके अलावा दिन भर बहुत से कार्यक्रम इत्यादि चलते रहते हैं।

  • मुख्य रूप से वैशाखी को सीख लोगों का पर्व माना जाता है इसलिए पंजाब राज्य में परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है।
  • किसान भाई बहन शाम के समय आग के पास इकट्ठा होकर के नई फसल की खुशियां मनाते हैं।
  • गुरु गोविंद सिंह द्वारा खालसा की स्थापना किए जाने की वजह से इस दिन गुरुद्वारों में भी काफी भीड़ होती है।
  • इस दिन सुबह 4:00 बजे गुरु ग्रंथ साहिब को समारोह पूर्वक कक्ष से बाहर लाया जाता है। दूध और जल से स्नान करवाने के बाद गुरु ग्रंथ साहिब को तत्व पर बैठाया जाता है इसके बाद पंच प्यारे पंच बानी गाते हैं।

वैशाखी का इतिहास

वैशाखी का इतिहास काफी पुराना है। अगर इसके इतिहास के पन्नों को पलट करके देखें तो हमें इसको मनाए जाने के पीछे कई सारी मान्यताएं देखने को मिलती है।

जब मुगल शासक औरंगजेब द्वारा जुलुम, अन्याय अत्याचार की हर सीमा लांग दी गई थी तब गुरु तेग बहादुर को दिल्ली में चांदनी चौक पर शहीद कर दिया गया था, तभी गुरु गोविंद सिंह ने अपने अनुयायियों को संगठित कर खालसा पंथ की स्थापना की जिसका लक्ष्य था धर्म व नेकी के आदर्श के लिए सदैव तत्पर रहना।

पुराने रीति-रिवाजों से ग्रसित निर्बल, कमजोर बा सा हसीन हो चुके लोग सदियों की राजनीतिक व मानसिक गुलामी के कारण कायर हो चुके थे। नीचे जाति के समझे जाने वाले लोगों को जिन्हें समाज कुछ समझता था, दशमेश पिता ने अमृत छाकर उन्हें सिंह बना दिया। इस तरह इस दिन यानी कि 13 अप्रैल 1699 को श्री केशगढ़ साहिब आनंदपुर में दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना कर अत्याचार को समाप्त किया था।

इस दौरान उन्होंने सभी जातियों के लोगों को अमृत पत्र बांटे। यह एक तरह से अमृत चाखा पाँच प्यारे किसी एक जातीय स्थान के नहीं थे। बल्कि अलग-अलग जाति और कुल वास स्थान के थे। जिन्हें खंडे बाटे का अमृत चखकर इनके नाम के साथ सिंह शब्द लगाया गया।

इसी दिन भारत में मनाए जाने वाले अन्य त्योहार

हिंदुओं के लिए या त्यौहार नववर्ष की शुरुआत होती है। हिंदू धर्म मानने वाले लोग इस दिन गंगा में स्नान करना शुभ मानते हैं। गंगा में स्नान करके भोग लगाकर और पूजा करके इस दिन को मनाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन गंगा धरती पर उतरी थी। उन्हीं के सम्मान में हिंदू धर्म मानने वाले लोग इस दिन पवित्र स्नान के लिए गंगा किनारे इकट्ठा होते हैं।

इसके अलावा इस दिन भारत के केरल राज्य में ‘ विशु’ का पर्व मनाया जाता है। इस दिन लोग नए कपड़े खरीदते हैं पटाखे फोड़ते हैं और ‘ विशु कानी’ को सजाते और सिंगार ते हैं। इसमें फूल, फल ,अनाज ,वस्त्र सोना आदि सजाए जाते हैं। इस समृद्धि के साथ में इस दिन नए वर्ष में सुख समृद्धि की कामना की जाती है।

वहीं उत्तराखंड में इसे बीखोरी उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग पवित्र नदियों में डुबकी लगाने की परंपरा है। यहां माना जाता है कि जिस दिन राक्षसों को पत्थरों से मारा गया था। जिस वजह से इस दिन उत्साह का पर्व होता है।

वहीं भारत के असम राज्य में 13 अप्रैल या 14 अप्रैल को असमिया नववर्ष की शुरुआत के रूप में इसे मनाया जाता है। इसे 7 दिन के लिए विशु संक्रांति वैशाख महीने या स्थानीय रूप से बोहाग के रूप में मनाया जाता है।

वहीं भारत के पश्चिमी बंगाल में इस दिन पाहिला वैशाख मनाया जाता है। पश्चिमी बंगाल के अलावा तिरूपुरा और बांग्लादेश में भी मंगल शोभा यात्रा के तौर पर इस दिन को मनाया जाता है। यह उत्साह साल 2016 में यूनेस्को द्वारा मानवता की संस्कृति विरासत के रूप में इसे सूचीबद्ध किया गया है।